बहते- बहते जब थक गई हवा बेचारी
तो आराम करने उतरी मेरे अगंना।
िफर मेरी बिगया मे िकया खूब धमाल
पेड पौधो- संग िमलकर खूब मचाई धमा चौकडी।
डाल से टूटे पतो को हवा मे उडाया कभी
कभी िदया जमीन पर पटक ।
कभी धूप मे पडे कपडो को
यहाँ से वहाँ िबखरा िदया।
दादाजी के कुरते मे घुसकर खूब िकया तंग
पर [...]
Archive for May 3rd, 2008
हवा
Posted in kavita,kala, tagged हवा, Blogroll, hindi poetry, kala, kavita, muskan, zindagi on May 3, 2008 | 3 Comments »

