हवा
May 3, 2008 by kmuskan
बहते- बहते जब थक गई हवा बेचारी
तो आराम करने उतरी मेरे अगंना।
िफर मेरी बिगया मे िकया खूब धमाल
पेड पौधो- संग िमलकर खूब मचाई धमा चौकडी।
डाल से टूटे पतो को हवा मे उडाया कभी
कभी िदया जमीन पर पटक ।
कभी धूप मे पडे कपडो को
यहाँ से वहाँ िबखरा िदया।
दादाजी के कुरते मे घुसकर खूब िकया तंग
पर जब समय का खयाल आया
तो उड गए उसके होश
बोली चलती हूं हो गई देर ।
लोट के िफर आऊगी
खूब धमा -चौकडी मचाऊगी


बहते- बहते जब थक गई हवा बेचारी
तो आराम करने उतरी मेरे अगंना।……….
एक जीवंत दृश्य कौंध गया,
तेज , अल्हड़ हवा तेजी से गुजर गई………
:)
sundar,dil machal gaya,hawaon se baatein karte,hawa sa behte bahut din ho gaya.hawa ke thande sprash ka ehsaas karva diya apne.
rasprabha & mehek
aapka bahut bahut shukriya