िकतने अचछे थे बचपन के वो पल
ना कोई िचंता, ना कोई काम
बेिफकरी का था आलम
हर वकत इधर- उधर खूब उधम मचाते
अपनी छोटी -छोटी शरारतो मे,लडाइयो मे उलझे रहते
बडो की लडाइयो से थे अंजान
हर इक से करते थे पयार
ना चाह थी दौलत की
ना चाह थी नाम की
खुद मे ही थे मसत
बडी बातो की ना थी समझ
छोटी-छोटी बातो से खुश हो जाते थे
छोटी-छोटी बातो पर रो भी दे थे
िकतने अचछे थे बचपन के वो पल


bahut hi sahi kaha,koi chinta nahi thi kuch bhi nahi,kash bachpan phir se lautkar aaye,bahut hi sundar.
ठीक कहा आपने.. बचपन के वे दिन बड़े सुहाने थे.. अब तो जीवन की आपाधापी में सब कुछ पीछे छूट गया है..
yahi to rona hai ki ab wapas bachhe nahin ban sakte.
sunder abhiyakti