जी भरकर जी ले इस पल को
जाने फिर ये पल हो न हो
हर खुशी को समेट ले अपनी बाहों में
जाने फिर ये पल हो न हो
गम की काली रात है बीती
सुबह का सूरज खुशियों का सवेरा लाया है
जी ले इन खुशियों को
जाने फिर ये पल हो न हो
कुदरत का नियम है रात के बाद
दिन को [...]
Archive for June, 2008
पल
Posted in zindagi, tagged कुदरत, पल, सूरज, Blogroll, hindi, kala, kavita, muskan, poetry, zindagi on June 30, 2008 | 3 Comments »
िजंदगी का पनना
Posted in zindagi, tagged िजंदगी, िदल, Blogroll, hindi, kala, kavita, muskan, poetry, zindagi on June 27, 2008 | 2 Comments »
ना जाने कया सोचकर
िदल की बातो को
कागज पर उतार िदया।
पर अगले ही पल
ना जाने कयू
कागज फाड िदया।
काश िजंदगी के साथ भी
ऐसा िकया जा सकता।
िकसी बेकार पनने को
िजंदगी की िकताब से फाडा जा सकता ।
क्योंकि आज मेरा चाँद बादलो में छिपा है
Posted in zindagi, tagged आसमान, कारवा, चाँद, दिन, पल, Blogroll, hindi, kavita, muskan on June 19, 2008 | 2 Comments »
नही खुशियों की कतार मंजूर ,नही रौशनी की सोगात मंजूर
क्योंकि आज मेरा चाँद बादलो में छिपा है
नही गमो की बात मंजूर ,नही तारो भरी रात मंजूर
क्योंकि आज मेरा चाँद बादलो में छिपा है
नही उमीदो का आसमान मंजूर ,नही भीड़ भरा कारवा मंजूर
क्योंकि आज मेरा चाँद बादलो में छिपा है
नही उसके बिन कोई पल मंजूर , [...]
अपना घर
Posted in kahani, tagged muskan, zindagi, hindi, Blogroll, औरत, अपना घर, kahani on June 16, 2008 | 3 Comments »
गीता आज एक ऐसे दोराहे पर खडी थी जहाँ उसे समझ नही आ रहा है िक वो कया करे ,कहाँ जाए िकससे अपने िदल की बात कहे।
उसकी माँ ने उसे बचपन से यही िसखाया था िक एक औरत का अपना घर उसका ससुराल होता है । मायके मे तो वो बस कुछ िदनो की मेहमान [...]
औरत की िजंदगी
Posted in zindagi, tagged kavita, muskan, hindi, poetry, kala, Blogroll, बचपन, छाँव, औरत, िजंदगी on June 12, 2008 | 8 Comments »
इक औरत की िजंदगी गुजर जाती ह,ै मुिशकलो से जुझने मे
कभी अपने हक के िलए तो, कभी अपने आसिततव के िलए
कभी अपने िलए तो, कभी अपनो के िलए।
बचपन से जवानी, जवानी से
बुढापा जुझती रहती है औरत
कभी- कभी तो इस दुिनया म,े
आने से पहले ही िवदा कर दी जाती है
जो खुशनसीब, दुिनया मे आ जाती है
वो [...]

