कल्पना की लकीरों से, तेरी एक तस्वीर बनाई है
जब भी देखती हूँ उसमे, तेरा ही अक्स नज़र आता है
किसी का उदास चेहरा उस, अजनबी फ़रिश्ते से देखा नही जाता
किसी कि भी आँखों में आंसू देख ,मदद को दोडा वो आता है
हर तरफ़ आग ही आग, मचा हाहाकार है
ऐसे माहौल में तू ,कैसे आराम फरमाता है
कल जब ये आग, तेरे घर तक पहुंच जायेगी
तब ही शायद जलन की पीड़ा को जान पायेगा
एक दिन वो रब, सब ठीक कर देगा
ऐसी बातें कह कर तू, क्यों ख़ुद को बरगलाता है
ख़ुद- ब -ख़ुद कुछ भी ठीक नही होता है
उस रब ने ये काम हमारे ही जिम्मे छोडा है


bahut hi acchi kavita .
कल्पना की लकीरों से, तेरी एक तस्वीर बनाई है
जब भी देखती हूँ उसमे, तेरा ही अक्स नज़र आता है
किसी का उदास चेहरा उस, अजनबी फ़रिश्ते से देखा नही जाता
किसी कि भी आँखों में आंसू देख ,मदद को दोडा वो आता है
mujhe ye pankhtiyan bahut pasand aayi hai ..
bahut badhai
kabhi mere blog par aayiyenga pls
vijay
poemsofvijay.blogspot.com
ख़ुद- ब -ख़ुद कुछ भी ठीक नही होता है
उस रब ने ये काम हमारे ही जिम्मे छोडा है…
बहुत सटीक लिखा आप ने
धन्यवाद
कविता की शुरूआत तो श्रंगाररस के आसपास घूमती है लेकिन पहले नुक्ते की दूसरा लाइन सामयिकता को छूने की कोशिश है। अंत में अकर्मण्यता पर प्रहार है। इसे तो किसी के लिए माना जा सकता है, सरकार के लिए, सोए तंत्र के लिए। अच्छा प्रयास।
बहुत सुन्दर रचना है
लगेगी आग उस घर में तो जलेगा तेरा भी घर
ये जानते हो तो फिर आग लगते क्यों हों
मदद को फ़रिश्ते वेशक आते है
और हम को भी ये संदेश देकर जाते है
मदद के वक्त तुम घर में क्यों छुप जाते हो
आपकी बारह लाइने बारह सौ पेज पर भारी हैं
हितैषी भावनाएं जाग्रत करने हम आपके आभारी हैं
मेरे ब्लॉग पर आने और मेरी रचना को पसंद करने के लिए आप सब का बहुत बहुत धन्यवाद
हर तरफ़ आग ही आग, मचा हाहाकार है
ऐसे माहौल में तू ,कैसे आराम फरमाता है
कल जब ये आग, तेरे घर तक पहुंच जायेगी
तब ही शायद जलन की पीड़ा को जान पायेगा
अत्यन्त सुंदर मनमोहक गंभीर चितन से उपजा हुया काव्य काश यह पंकितयां हमारे सम्मानीय पी एम् साहेब तक पहुँच पायें
नया साल आपको मंगलमय हो