फ़िर से लग गई है दुकाने
फ़िर से सज गए है बाज़ार
दिल्ली फ़िर अपनी रफ़्तार से चल पड़ी है
धमाके के मंजर को भूल ज़िन्दगी फ़िर पटरी पे आ गई है
पर वो कैसे भूल पायेंगे ……..
जिसके घर के चिराग इस नफरत की आग में जल गए
वो कैसे भूल पायेंगे ……………
जिसने अपने जिस्म पे उन घावो को झेला [...]
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नफरत की आग
Posted in zindagi, tagged आग, घर, घाव, चोट, जवाब .., ज़िन्दगी, जिस्म, नफरत, बाज़ार, मुआवजा, सवाल, Blogroll, hindi, kala, kavita, muskan, poetry, zindagi on September 18, 2008 | 6 Comments »
बहुत दिनों बाद
Posted in zindagi, tagged घर, बचपन, मजा, सामान, Blogroll, hindi, kala, kavita, muskan, poetry, zindagi on August 19, 2008 | 3 Comments »
आज बहुत दिनों बाद कुछ लिखने बैठी हूँ ।घर में तोड़ फोड़ ,साफ सफाई का काम हो रहा था ,इस कारण कंप्यूटर को कुछ दिनों के लिए बंद क्र रखा था । बचपन में तो जब भी घर में रंग रोगन का काम होता था , तो बहुत मजा आता था । सारे घर का [...]

