इक औरत की िजंदगी गुजर जाती ह,ै मुिशकलो से जुझने मे
कभी अपने हक के िलए तो, कभी अपने आसिततव के िलए
कभी अपने िलए तो, कभी अपनो के िलए।
बचपन से जवानी, जवानी से
बुढापा जुझती रहती है औरत
कभी- कभी तो इस दुिनया म,े
आने से पहले ही िवदा कर दी जाती है
जो खुशनसीब, दुिनया मे आ जाती है
वो [...]
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औरत की िजंदगी
Posted in zindagi, tagged औरत, छाँव, बचपन, िजंदगी, Blogroll, hindi, kala, kavita, muskan, poetry on June 12, 2008 | 8 Comments »
मुझे जाने दो
Posted in zindagi, tagged छाँव, दिल, मुस्कान, Blogroll, hindi, kavita, muskan, zindagi on May 19, 2008 | 4 Comments »
मेरे होठो की मुस्कान देखकर
गर वो समझते है की मैं खुश हूँ
तो उन्हें इसी
गलतफहमी मे खुश होने दो
कल उजड़ जाएगा मेरा ये आशिअना
जाने फ़िर कहाँ बसेरा पाऊँगी
कम से कम आज की रात
तो मुझे चैन से सोने दो
दिल का गुबार आंखो से
आंसू बन बह निकला है
कोई न रोको इसे
आज जी भर के रोने दो [...]

