आज बहुत दिनों बाद कुछ लिखने बैठी हूँ ।घर में तोड़ फोड़ ,साफ सफाई का काम हो रहा था ,इस कारण कंप्यूटर को कुछ दिनों के लिए बंद क्र रखा था । बचपन में तो जब भी घर में रंग रोगन का काम होता था , तो बहुत मजा आता था । सारे घर का [...]
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बहुत दिनों बाद
Posted in zindagi, tagged घर, बचपन, मजा, सामान, Blogroll, hindi, kala, kavita, muskan, poetry, zindagi on August 19, 2008 | 3 Comments »
मुसकान
Posted in zindagi, tagged अमन, बचपन, मुसकान, Blogroll, hindi, kala, kavita, muskan, poetry, zindagi on July 12, 2008 | 3 Comments »
aaj achank hi yeh rachana mere samane aa gayi jise mene aase hi kitab me likhkar chod diya tha .aaj aap logo ke liya lekar aayi hoon.apne comment ke jariye batayega jarur ki aapko kaisi lagi
खुद को चारदीवारो मे बंद िकये बैठे थे
घर से िनकले तो याद आया फागुन है
नफरतो की आँधी ने िबखेर िदया [...]
औरत की िजंदगी
Posted in zindagi, tagged औरत, छाँव, बचपन, िजंदगी, Blogroll, hindi, kala, kavita, muskan, poetry on June 12, 2008 | 8 Comments »
इक औरत की िजंदगी गुजर जाती ह,ै मुिशकलो से जुझने मे
कभी अपने हक के िलए तो, कभी अपने आसिततव के िलए
कभी अपने िलए तो, कभी अपनो के िलए।
बचपन से जवानी, जवानी से
बुढापा जुझती रहती है औरत
कभी- कभी तो इस दुिनया म,े
आने से पहले ही िवदा कर दी जाती है
जो खुशनसीब, दुिनया मे आ जाती है
वो [...]
बचपन
Posted in zindagi, tagged पल, बचपन, Blogroll, hindi poetry, kala, kavita, muskan on May 5, 2008 | 3 Comments »
िकतने अचछे थे बचपन के वो पल
ना कोई िचंता, ना कोई काम
बेिफकरी का था आलम
हर वकत इधर- उधर खूब उधम मचाते
अपनी छोटी -छोटी शरारतो मे,लडाइयो मे उलझे रहते
बडो की लडाइयो से थे अंजान
हर इक से करते थे पयार
ना चाह थी दौलत की
ना चाह थी नाम की
खुद मे ही थे मसत
बडी बातो की ना [...]

