Feeds:
पोस्ट
टिप्पणियाँ

Archive for जून, 2008

जी भरकर जी ले इस पल को
जाने फिर ये पल हो न हो
हर खुशी को समेट ले अपनी बाहों में
जाने फिर ये पल हो न हो
गम की काली रात है बीती
सुबह का सूरज खुशियों का सवेरा लाया है
जी ले इन खुशियों को
जाने फिर ये पल हो न हो
कुदरत का नियम है रात के बाद
दिन को , दिन के बाद रात को आना है
हर दिन को जी ले जी भर के
जाने फ़िर ये पल हो न हो

Advertisements

Read Full Post »

ना जाने कया सोचकर
िदल की बातो को
कागज पर उतार िदया।

पर अगले ही पल
ना जाने कयू
कागज फाड िदया।

काश िजंदगी के साथ भी
ऐसा िकया जा सकता।
िकसी बेकार पनने को
िजंदगी की िकताब से फाडा जा सकता ।

Read Full Post »

नही खुशियों की कतार मंजूर ,नही रौशनी की सोगात मंजूर
क्योंकि आज मेरा चाँद बादलो में छिपा है
नही गमो की बात मंजूर ,नही तारो भरी रात मंजूर
क्योंकि आज मेरा चाँद बादलो में छिपा है
नही उमीदो का आसमान मंजूर ,नही भीड़ भरा कारवा मंजूर
क्योंकि आज मेरा चाँद बादलो में छिपा है
नही उसके बिन कोई पल मंजूर , नही उसके बिन कोई दिन मंजूर
क्योंकि आज मेरा चाँद बादलो में छिपा है

Read Full Post »

गीता आज एक ऐसे दोराहे पर खडी थी जहाँ उसे समझ नही आ रहा है िक वो कया करे ,कहाँ जाए िकससे अपने िदल की बात कहे।

उसकी माँ ने उसे बचपन से यही िसखाया था िक एक औरत का अपना घर उसका ससुराल होता है । मायके मे तो वो बस कुछ िदनो की मेहमान होती है ुउसकी िवदाई के वकत भी माँ ने यही कहा था िक आज इस घर से तेरी डोली जा रही है और अब तेरा ससुराल ही तेरा घर है । गीता ने भी यही सोच कर ससुराल मे कदम रखा था िक अब ये ही मेरा घर है मेरा अपना घर ।

पर कुछ ही िदनो मे उसके सारे सपने िबखर गए। जब धीरे धीरे उसके ससुराल वालो की असिलयत उसके सामने आने लगी । उसे पता चला िक उसके पित का िकसी ओर के साथ िरशता था जो अभी भी है लेिकन घर वाले उस िरशते के िलए तैयार नही थे । उसने घर वालो की खुिशयो के िलए गीता से शादी तो कर ली पर कभी उसे अपनी पतनी का सममान नही िदया।
जब पित ने ही सममान नही िदया तो वो ससुराल के ओर लोगो से कया अपेकशा करती ।उसे बात बात पर ताने िदए जाते थे लेिकन वो सब कुछ इसे अपनी िकसमत मान के सहती रहती थी । करती भी कया , कहती भी िकससे ,उस घर मे उसकी सुनने वाला था भी कौन । पित तो हो कर भी नही के बराबर था । पर इक िदन हद हो गई उसे ये कहके िक ये तेरा घर नही है उसे घर से बाहर िनकाल िदया गया । गीता िकतना िगडिगडाई पर ना िकसी पर असर पडना था ना पडा

अब गीता कया करे वह खुद नही समझ पा रही थी । मायका तो पहले ही िछन चुका था आज ससुराल से भी िनकाल िदया गया । वह समझ नही पा रही थी िक उसका अपना घर कौन सा है।
कया आप मे से कोई ये बता सकता है

Read Full Post »

इक औरत की िजंदगी गुजर जाती ह,ै मुिशकलो से जुझने मे
कभी अपने हक के िलए तो, कभी अपने आसिततव के िलए
कभी अपने िलए तो, कभी अपनो के िलए।

बचपन से जवानी, जवानी से
बुढापा जुझती रहती है औरत
कभी- कभी तो इस दुिनया म,े
आने से पहले ही िवदा कर दी जाती है
जो खुशनसीब, दुिनया मे आ जाती है
वो पूरी िजंदगी अपने आसिततव की लडाई लडती रहती हैै
दुख होता है जब एक औरत ही हो जाती है औरत की दुशमन।
दुख होता है जब कभी बेटे बेटी मे फरक होता है
बेटी तो होती है बेटे से बडकर।

िपता के पयार के साए मे पली
माँ के आँचल मे रही इक लडकी
अपने ढेरो सपनो को साथ िलए पहुँचती है िपया के घर
दुख होता है जब हर सपना टूट जाता है
वो पित के िलए होती है िसरफ इक गुलाम
पित के आसरे बीत जाती है जवानी उसकी सारी।

बचपन िपता की छाँव मे
जवानी पित के आसरे
बुढापे मे हो जाती हे बेट ेकी मोहताज
बचचो को पाल पोसकर बडा करती है वो
हर दुख दरद मे साथ खडी होती है वो
माँ तो होती है ईशवर का वरदान
दुख होता है जब अपना खून पानी हो जाता है
खुद का बचचा पराया हो जाता है
माँ को नही वो पहचानता है

यही है औरत की कहानी
बचपन जवानी बुढापे मे जब भी
कीसी से आसरा मागँती ह,ै वो बेगाना हो जाता है
िजसे भी अपना मानती है, वो अनजाना हो जाता है
हर िरशते को जी भरकर देती है
बदले मे िसवा पयार के कुछ नही चाहती

Read Full Post »

बहुत दिनों तक दिल्ली से बाहर रही इसलिए कुछ लिख नही पाई लेकिन अब फिर से दिल्ली मे हूँ इसलिए कुछ पंक्तिया लिख रही हूँ

तेरे दर पे आई हूँ ,ले के फिरयाद
तू तो जानता हैं ,क्या हैं मेरी मुराद

मेरे दिल की कोई बात ,तुझसे कहाँ छुपी है
पूरी कर दे आज , मेरी हर मुराद

तेरे सिवा और कौन ,मेरा अपना है
एक तेरा दर ही ,मेरा सहारा है

Read Full Post »