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Archive for सितम्बर, 2008

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कहने को तो पानी का एक कतरा है पर

कितने ही जज्बातों का दरिया है



हर सपने को बड़े प्यार से आँखों में छुपा रखा था

आँख से आंसू बन के बहा जो, वही टुटा हुआ इक सपना है



बिन कहे मेरे दिल के हर जज्बात को बयां कर जाते है

खुशी हो या गम हर दम साथ निभाते है

लाख छुपाना चाहूं मैं

पर ये आंसू चुगली कर जाते है


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हमने उन कि याद में रो रो के टब भर दिए

वो आए और नहा के चल दिए
(ये मेरा लिखा नही है)

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फ़िर से लग गई है दुकाने
फ़िर से सज गए है बाज़ार
दिल्ली फ़िर अपनी रफ़्तार से चल पड़ी है
धमाके के मंजर को भूल ज़िन्दगी फ़िर पटरी पे आ गई है
पर वो कैसे भूल पायेंगे ……..
जिसके घर के चिराग इस नफरत की आग में जल गए
वो कैसे भूल पायेंगे ……………
जिसने अपने जिस्म पे उन घावो को झेला है
वो कैसे भूल पायेंगे …………
जिसने हँसते-मुस्कुराते लोगो को चीथडो में तब्दील होता देखा है
जल कर मर गए जो इस आग में
उनकी ज़िन्दगी की कीमत लगा कर ,
उनका मुआवजा तो दे दिया जायेगा
पर जो जिंदगियां जीते जी मर गई ,उनका मुआवजा कौन देगा
उस बच्चे के सवालो का जवाब कौन देगा …….
जो बार -बार अपने पापा के लिए रो रहा है
उस पिता के सवालो का जवाब कौन देगा ………
जिसने अपने जवान बेटे को खो दिया है
उस राष्ट्र को जवाब कौन देगा ……….
जिसका एक घाव भरता नही है की उसके सीने में कोई और चोट कर दी जाती है
कौन देगा इन सवालों का जवाब ………..कौन ?

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कभी कभी ये सोचती हूँ कि
क्या आंतकवादी इंसान नही होते
अगर होते है तो
क्यों उनकी आत्मा उन्हें धिक्कारती  नही है……….जब वो निर्दोषों का लहू बहाते है
क्यों उनकी आत्मा उनसे ये नही पूछती कि ………. वो मासूम जिंदगियों को क्यों तबाह कर रहे है
सड़क पे पड़े मांस के चीथडो को देखके भी वो कैसे चैन से सो पाते है
कहीं उनके शरीर में दिल की जगह पत्थर तो नही है
हाँ ,ऐसा ही होगा
तभी तो किसी की चीखो से उनका दिल नही पसीजता
ऐसा ही है
तभी तो किसी की बर्बादी में उन्हें अपना मकसद पूरा होता दिखता है
शायद उनके पास दिमाग भी नही होता ……….
तभी वो ये नही समझ पाते आख़िर वो क्या कर रहे है
जो आग आज वो दूसरो के घर में लगा रहे है
उससे वो भी नही बच पाएंगे
हाँ ,शायद वो इंसान नही होते ……………
जिसके पास दिल,दिमाग और आत्मा ना हो वो इंसान हो भी कैसे सकता है

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वो फूल ही कया जिसमे खुशबू ना हो

वो दिल ही कया जिसमे किसी का पयार न हो

वो पयार ही कया जिसमे दरद ना हो

वो दरद ही कया जिसमे साथ ना हो

वो साथ ही कया जिसमे अहसास ना हो

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अपने ही कंधो पे ,अपनी लाश लिए जा रहे है
जाने किस , उम्मीद में जिए जा रहे है
जानती हूँ ,तू शामिल नही अब मेरी जिंदगी में
फिर भी तुझे याद किए जा रहे हैै

गलत राह पे पड़ते तेरे कदमो को, जब रोकना चाहा मैंने
तो तुम छोड़ के मुझे अकेला, मुझसे दूर, बहुत दूर चले गए
तेरे लोटने के इंतज़ार में
एक एक पल को गिने जा रहे हैै

तुझसे शिकवे -शिकायत भी है ,पर तेरा इंतज़ार भी है
तेरे दिए गमो को नही भूले है ,पर तुझसे जुड़ी खुशियाँ भी याद है मुझे
तेरी दी हुई खुशियों के सहारे ही हम
पैमाना -ऐ -गम पिए जा रहे है

कभी कभी ख़ुद से यही पूछती हूँ
आख़िर क्यों इस बेमतलब की
जिंदगी को
जिए जा रहे है

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