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Archive for the ‘kavita,kala’ Category

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दबे कदमो से
सब से छुपते छुपाते
आज चाँद उतर आया मेरे आँगन ।
सुना था कि,
चाँद में दाग होता है ।
हां ,दाग तो था , पर,
वो उसकी खूबसूरती को ओर भी बढा  रहा था।
मैं उसकी आभा में ऐसी खोई,
कि एकटक उसे निहारती ही रही
जाने कब तक ।
जब होश आया तो, उससे कुछ कहना चाहा
पर,
उसके जाने का समय हो गया था ।
वो बिना कुछ कहे,
बिना कुछ सुने,
बस अपना दीदार करा कर चला गया

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बहते- बहते जब थक गई हवा बेचारी
तो आराम करने उतरी मेरे अगंना।

िफर मेरी बिगया मे िकया खूब धमाल
पेड पौधो- संग िमलकर खूब मचाई धमा चौकडी।

डाल से टूटे पतो को हवा मे उडाया कभी
कभी िदया जमीन पर पटक ।

कभी धूप मे पडे कपडो को
यहाँ से वहाँ िबखरा िदया।

दादाजी के कुरते मे घुसकर खूब िकया तंग
पर जब समय का खयाल आया
तो उड गए उसके होश
बोली चलती हूं हो गई देर ।

लोट के िफर आऊगी
खूब धमा -चौकडी मचाऊगी

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कुछ िदल से

िदल मे दबी बात कभी
िकसी से कह ही नही पाए
कभी लफजो ने साथ नही िदया
तो कभी िदल ने इजाजत नही दी

िदल की बात िदल
मे ही दब कर रह गई
पर कलम हाथ मे आते ही
” कुछ िदल से ” बनकर पननो पे उतर गई

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