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Posts Tagged ‘छाँव’

इक औरत की िजंदगी गुजर जाती ह,ै मुिशकलो से जुझने मे
कभी अपने हक के िलए तो, कभी अपने आसिततव के िलए
कभी अपने िलए तो, कभी अपनो के िलए।

बचपन से जवानी, जवानी से
बुढापा जुझती रहती है औरत
कभी- कभी तो इस दुिनया म,े
आने से पहले ही िवदा कर दी जाती है
जो खुशनसीब, दुिनया मे आ जाती है
वो पूरी िजंदगी अपने आसिततव की लडाई लडती रहती हैै
दुख होता है जब एक औरत ही हो जाती है औरत की दुशमन।
दुख होता है जब कभी बेटे बेटी मे फरक होता है
बेटी तो होती है बेटे से बडकर।

िपता के पयार के साए मे पली
माँ के आँचल मे रही इक लडकी
अपने ढेरो सपनो को साथ िलए पहुँचती है िपया के घर
दुख होता है जब हर सपना टूट जाता है
वो पित के िलए होती है िसरफ इक गुलाम
पित के आसरे बीत जाती है जवानी उसकी सारी।

बचपन िपता की छाँव मे
जवानी पित के आसरे
बुढापे मे हो जाती हे बेट ेकी मोहताज
बचचो को पाल पोसकर बडा करती है वो
हर दुख दरद मे साथ खडी होती है वो
माँ तो होती है ईशवर का वरदान
दुख होता है जब अपना खून पानी हो जाता है
खुद का बचचा पराया हो जाता है
माँ को नही वो पहचानता है

यही है औरत की कहानी
बचपन जवानी बुढापे मे जब भी
कीसी से आसरा मागँती ह,ै वो बेगाना हो जाता है
िजसे भी अपना मानती है, वो अनजाना हो जाता है
हर िरशते को जी भरकर देती है
बदले मे िसवा पयार के कुछ नही चाहती

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मेरे होठो की मुस्कान देखकर
गर वो समझते है की मैं खुश हूँ
तो उन्हें इसी
गलतफहमी मे खुश होने दो 

कल उजड़ जाएगा मेरा ये आशिअना
जाने फ़िर कहाँ बसेरा पाऊँगी
कम से कम आज की रात
तो मुझे चैन से सोने दो 

दिल का गुबार आंखो से
आंसू बन बह निकला है
कोई न रोको इसे
आज जी भर के रोने दो 

जा रही हूँ आज ,तेरी
छाँव  के बिना कैसे रह पाऊँगी
लौट के फिर आने के लिए
आज मुझे जाने दो

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