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Posts Tagged ‘पल’

ज़िन्दगी जाने तू क्या चाहती है
जाने किस मोड़ पे मुझे लिए जा रही है
मेरे खवाबो  ,मेरी  तम्मनाओ को
पीछे छोड़ जाने किस और चली जा रही है


जाने कयों तु मेरी हर कोशिश को
नाकाम  करने में  लगी है
मुझसे तेरी जाने  क्या दुश्मनी है
कुछ पल तो मुझे चैन  के लेने दे


तू क्या चाहती है ,मैं नही जानती
पर ख़ुद को तेरी ही धारा में छोड़ कर
मैं बिना कुछ सोच-समझे

तेरी ही रौ में बही जा रही हूँ

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ज़िंदगी की भाग-दोड में जाने वो पल कहाँ खो गए


जब कुछ पल बैठ कर चैन से बतिया लिया करते थे


एक चाए के प्याले संग


जाने वो पल कहाँ खो गए


जब सावन की पहली बारिश


तन और मन दोनों को भिगो जाती थी


जाने वो पल कहाँ खो गए


जब कितने ही पल डूबते सूरज को निहारते बीत जाते थे


जब घंटो तक चाँद-तारो की दुनिया मे खोये रहते थे


जाने वो पल कहाँ खो गए


जिसमे बसा था इन्द्रधनुष का हर रंग


हर रंग दूजे से जुदा था


पर फिर भी एक-दूजे से जुडा था


जाने वो पल कहाँ खो गए


जब हर चिंता से मुक्त था जीवन


बस अपनी ही छोटी सी दुनिया में मस्त था जीवन


जाने वो पल कहाँ खो गए

काश लौट कर आ सकते वो पल

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अपने ही कंधो पे ,अपनी लाश लिए जा रहे है
जाने किस , उम्मीद में जिए जा रहे है
जानती हूँ ,तू शामिल नही अब मेरी जिंदगी में
फिर भी तुझे याद किए जा रहे हैै

गलत राह पे पड़ते तेरे कदमो को, जब रोकना चाहा मैंने
तो तुम छोड़ के मुझे अकेला, मुझसे दूर, बहुत दूर चले गए
तेरे लोटने के इंतज़ार में
एक एक पल को गिने जा रहे हैै

तुझसे शिकवे -शिकायत भी है ,पर तेरा इंतज़ार भी है
तेरे दिए गमो को नही भूले है ,पर तुझसे जुड़ी खुशियाँ भी याद है मुझे
तेरी दी हुई खुशियों के सहारे ही हम
पैमाना -ऐ -गम पिए जा रहे है

कभी कभी ख़ुद से यही पूछती हूँ
आख़िर क्यों इस बेमतलब की
जिंदगी को
जिए जा रहे है

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नजारा

दुनिया की भीड़ में खो गए, तुम कहाँ


हर पल नज़रे तुम्हे ही ढूंढती है


जानती है की तुम नही हो यहाँ, पर


फ़िर भी तुम्हारा ही नजारा ढूंढती है

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सामना

उस पल को बीते जमाना हो गया
जब हुआ था मेरा तुझसे सामना
आज अगर तुम मिल भी जाओ तो
हम दो अजनबियों की तरह
एक दूजे को बिना देखे ही गुजर जायंगे

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जी भरकर जी ले इस पल को
जाने फिर ये पल हो न हो
हर खुशी को समेट ले अपनी बाहों में
जाने फिर ये पल हो न हो
गम की काली रात है बीती
सुबह का सूरज खुशियों का सवेरा लाया है
जी ले इन खुशियों को
जाने फिर ये पल हो न हो
कुदरत का नियम है रात के बाद
दिन को , दिन के बाद रात को आना है
हर दिन को जी ले जी भर के
जाने फ़िर ये पल हो न हो

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नही खुशियों की कतार मंजूर ,नही रौशनी की सोगात मंजूर
क्योंकि आज मेरा चाँद बादलो में छिपा है
नही गमो की बात मंजूर ,नही तारो भरी रात मंजूर
क्योंकि आज मेरा चाँद बादलो में छिपा है
नही उमीदो का आसमान मंजूर ,नही भीड़ भरा कारवा मंजूर
क्योंकि आज मेरा चाँद बादलो में छिपा है
नही उसके बिन कोई पल मंजूर , नही उसके बिन कोई दिन मंजूर
क्योंकि आज मेरा चाँद बादलो में छिपा है

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