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Posts Tagged ‘बचपन’

आज बहुत दिनों बाद कुछ लिखने बैठी हूँ ।घर में तोड़ फोड़ ,साफ सफाई का काम हो रहा था ,इस कारण कंप्यूटर को कुछ दिनों के लिए बंद क्र रखा था । बचपन में तो जब भी घर में रंग रोगन का काम होता था , तो बहुत मजा आता था । सारे घर का सामान इधर से उधर होता था तो उस सामान में बहुत सारी चीजे अपने मतलब की भी मिल जाती थी ।आज भी बहुत कुछ मिला कुछ पुरानी यादें ,पुरानी तस्वीरे और कुछ पन्ने जिन पे मेरी कुछ पुरानी कविताये थी । अपनी पुरानी कवितायों में से एक कविता मैं अपनी अगली पोस्ट में डालूंगी ।
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aaj achank hi yeh  rachana mere samane aa gayi jise mene aase hi kitab me likhkar chod diya tha .aaj aap logo ke liya lekar aayi hoon.apne comment ke jariye batayega jarur ki aapko kaisi lagi

खुद को चारदीवारो मे बंद िकये बैठे थे
घर से िनकले तो याद आया फागुन है

नफरतो की आँधी ने िबखेर िदया घरौँदा मेरा
शुकर है आज तो अमन है

हर तरफ बरसता था पयार ही पयार
ऐसा मेरा पयारा बचपन है

पूछते है वो कौन हूँ मै
कोई बता दे उंहे नाचीज मुसकान है

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इक औरत की िजंदगी गुजर जाती ह,ै मुिशकलो से जुझने मे
कभी अपने हक के िलए तो, कभी अपने आसिततव के िलए
कभी अपने िलए तो, कभी अपनो के िलए।

बचपन से जवानी, जवानी से
बुढापा जुझती रहती है औरत
कभी- कभी तो इस दुिनया म,े
आने से पहले ही िवदा कर दी जाती है
जो खुशनसीब, दुिनया मे आ जाती है
वो पूरी िजंदगी अपने आसिततव की लडाई लडती रहती हैै
दुख होता है जब एक औरत ही हो जाती है औरत की दुशमन।
दुख होता है जब कभी बेटे बेटी मे फरक होता है
बेटी तो होती है बेटे से बडकर।

िपता के पयार के साए मे पली
माँ के आँचल मे रही इक लडकी
अपने ढेरो सपनो को साथ िलए पहुँचती है िपया के घर
दुख होता है जब हर सपना टूट जाता है
वो पित के िलए होती है िसरफ इक गुलाम
पित के आसरे बीत जाती है जवानी उसकी सारी।

बचपन िपता की छाँव मे
जवानी पित के आसरे
बुढापे मे हो जाती हे बेट ेकी मोहताज
बचचो को पाल पोसकर बडा करती है वो
हर दुख दरद मे साथ खडी होती है वो
माँ तो होती है ईशवर का वरदान
दुख होता है जब अपना खून पानी हो जाता है
खुद का बचचा पराया हो जाता है
माँ को नही वो पहचानता है

यही है औरत की कहानी
बचपन जवानी बुढापे मे जब भी
कीसी से आसरा मागँती ह,ै वो बेगाना हो जाता है
िजसे भी अपना मानती है, वो अनजाना हो जाता है
हर िरशते को जी भरकर देती है
बदले मे िसवा पयार के कुछ नही चाहती

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िकतने अचछे थे बचपन के वो पल
ना कोई िचंता, ना कोई काम
बेिफकरी का था आलम

हर वकत इधर- उधर खूब उधम मचाते
अपनी छोटी -छोटी शरारतो मे,लडाइयो मे उलझे रहते
बडो की लडाइयो से थे अंजान
हर इक से करते थे पयार

ना चाह थी दौलत की
ना चाह थी नाम की
खुद मे ही थे मसत
बडी बातो की ना थी समझ
छोटी-छोटी बातो से खुश हो जाते थे
छोटी-छोटी बातो पर रो भी दे थे
िकतने अचछे थे बचपन के वो पल

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