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Posts Tagged ‘रब’

कल्पना की लकीरों से, तेरी एक तस्वीर बनाई है
जब भी देखती हूँ उसमे, तेरा ही अक्स नज़र आता है
किसी का उदास चेहरा उस, अजनबी फ़रिश्ते से देखा नही जाता
किसी कि भी आँखों में आंसू देख ,मदद को दोडा वो आता है


हर तरफ़ आग ही आग, मचा हाहाकार है
ऐसे माहौल में तू ,कैसे आराम फरमाता है
कल जब ये आग, तेरे घर तक पहुंच जायेगी
तब ही शायद जलन की पीड़ा को जान पायेगा


एक दिन  वो रब, सब ठीक कर देगा
ऐसी बातें कह कर तू, क्यों ख़ुद को बरगलाता  है
ख़ुद- ब -ख़ुद कुछ भी ठीक नही होता है
उस रब ने ये काम हमारे ही जिम्मे  छोडा है


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