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Archive for मई, 2008

इक पल मे कितना कुछ बदल जाता है
पैसा कैसे सब रिश्तो को तोड़ देता है
आज जान पाई हूँ
पागल थी मैं जो इन रिश्तो को अपना मान बैठी  थी
पागल थी मैं जो इन पर अपना सब कुछ वार बैठी  थी
सोचती थी मेरे सुख दुःख के साथी है
हर दुःख मे मुझको थाम लेंगे
पर गलत थी मैं
वो तो मेरे हर सुख को दुःख मे बदलने को तैयार बैठे है
आज जान पाई हूँ
रिश्तों की बेवफाई को
कल तक जिनके लिए हम अपनों से भी अपने थे
क्यों आज इतने पराए हो गए
की हमारी मौजुदगी भी उन्हें खलती है

मैं नही जानती कौन गलत है कौन सही
ना मैं चाहती हूँ किसी को गलत ठहराना
मैं चाहती हूँ तो इतना की
पैसा हमारे रिशेते को तोड ना पाए
हम चाहे दूर रहे पर
मन मे एक दूसरे के लिए नफरत न रखे
एक दूसरे की खुशियों से न जले
एक दूसरे का बुरा न चाहे

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मेरे होठो की मुस्कान देखकर
गर वो समझते है की मैं खुश हूँ
तो उन्हें इसी
गलतफहमी मे खुश होने दो 

कल उजड़ जाएगा मेरा ये आशिअना
जाने फ़िर कहाँ बसेरा पाऊँगी
कम से कम आज की रात
तो मुझे चैन से सोने दो 

दिल का गुबार आंखो से
आंसू बन बह निकला है
कोई न रोको इसे
आज जी भर के रोने दो 

जा रही हूँ आज ,तेरी
छाँव  के बिना कैसे रह पाऊँगी
लौट के फिर आने के लिए
आज मुझे जाने दो

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तेरी इक नजर को तरसे है ये नैना
पर तू ना जाने कहाँ  गुम है।
ख्वाबो मे इक झलक दिखलाकर
फिर से ना जाने कहाँ  गुम है।
तुझसे ना दूर होंगे ऐसा तेरा वादा था
पर हर वादा भूलकर तू ना जाने कहाँ  गुम है ।

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तुम साथ हो तो सब अच्छा लगता है
अंधेरे मे भी रोशनी का रंग दिखता है
हो के जुदा तुमसे ये चाँद भी हमे दर्द देता है

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तु कया लूटेगा उन लूटे हूओ को
जो पहले ही वकत के हाथो लूटे है ।

तोड़ सकी जिस ना मुश्किलें हजार
आज वो अपनों के हाथो ही टूटे है ।

कब तक हर दुःख को अपने दामन मे समेटू
आज ये दामन मुझसे छूटे है ।

ये रिश्ते ही थे मेरा सारा संसार
आज इस संसार मे मेरा दम घुटे है ।

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ना जा उनके मुहलले मे उनकी गिलयाँ तंग हो गई है
छोड के अपनी जमीं वो भी हमारे संग हो गई है

इधर उधर नजरे ना जाने कया ढूढँती है
तुमहे सामने पा के ये दंग हो गई है

आसमान पे सतरंगी सपनो की घटाएँ छाई है
लगता है जैसे सारी दुिनया एकरंग हो गई है

बन िततली खुले गगन मे वो उड जाएँगी
कह दो जमाने को वो कटी पतंग हो गई है

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चोखट पर नजरे लगाए बैठे थे, इंतज़ार मे नजरे बिछाये बैठे थे
दरवाजे पर कोई दस्तक हुई , पर क्या ये तुम हो ।

सपनों मे रोज़ मिलते थे तुमसे ,दूर जाकर भी तुम दूर हो न पाए
दर पर मेरे खड़ा है कोई ,पर क्या यह तुम हो ।

नजर आती है चिथडो मे लिपटी काया , मुख पर सलवटे हजार
तुम तो ऐसे न थे ,पर क्या यह तुम हो ।

बरसों न जाने कहां रहे ,इक बार मेरी सुध तक न ली
मेरी सुध लेने आया हैं जो ,पर क्या ये तुम हो ।

छोड़ गए थे मुझे ,जाने किस आसरे
लौट कर आए जो तुम ,पर क्या ये तुम हो ।

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