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Archive for अगस्त, 2008

आज फिर कान्हा धरती पर आएँगे


फिर लीला दिखलाएँगे


फिर मटकी तोड़ के माखन चुराएंगे


आज फिर कान्हा धरती पर आएँगे


फिर गोपियों संग


यमुना तीर पर रास रचायेंगे


आज फिर
बर्ज श्याम रंग में रंग जाएगा


आज फिर कान्हा धरती पर आएँगे


फिर गीता की वाणी गूंजेगी


फिर भटको को राह दिखायेगे


आज फिर कान्हा धरती पर आएँगे


मेरे कान्हा आज फिर धरती पर आयेंगे

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पेपर

ये मेरी लिखी पहली कविता है इसे मैंने स्कूल के दिनों में लिखा था इसकी अन्तिम पंक्ति में मेरी फ्रेंड ने कुछ correction भी किया था

पेपर में जब नंबर कम आए
तो मम्मी ने डांट लगाई
मम्मी को अब क्या पता
पेपर तो हमारा बहुत अच्छा गया था
फ़िर ये नंबर कम कैसे आए
ये सब मैडम की मेहरबानी है
मैडम हमारे नंबर काट लेती है
वैसे तो कहती है…
बहुत ही अच्छा लिखा है
परन्तु जब नंबर देने की बारी आती है
तो बहुत ही कंजूसी देखाती है
बीस में से बस दस ही हाईसट देती है
और बाद में कहती है….
मैंने तुम्हे बहुत ही खुले नंबर दिए है
ओर करो तुम मेहनत बच्चो
तो ही जीवन में कुछ बन पाओगे
कह कर फ़िर चली जाती है

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आज बहुत दिनों बाद कुछ लिखने बैठी हूँ ।घर में तोड़ फोड़ ,साफ सफाई का काम हो रहा था ,इस कारण कंप्यूटर को कुछ दिनों के लिए बंद क्र रखा था । बचपन में तो जब भी घर में रंग रोगन का काम होता था , तो बहुत मजा आता था । सारे घर का सामान इधर से उधर होता था तो उस सामान में बहुत सारी चीजे अपने मतलब की भी मिल जाती थी ।आज भी बहुत कुछ मिला कुछ पुरानी यादें ,पुरानी तस्वीरे और कुछ पन्ने जिन पे मेरी कुछ पुरानी कविताये थी । अपनी पुरानी कवितायों में से एक कविता मैं अपनी अगली पोस्ट में डालूंगी ।

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